।। दीपक की आरज़ू ।।

 ।। दीपक की आरज़ू ।।



एक दीपक की आरज़ू 

कि वो जलना चाहे


हवा तेज़ सही, 

फिर भी वो लौ बनना चाहे


ज़ख़्म कितने भी आये 

पर वो सिपाही था


वतन पर मर-मिटने में ही 

वो खुश रहना चाहे


और मन्दिर का पुजारी क्या जाने 

ख़ुदा कहाँ-कहाँ बैठा


ख़ुदा से पूछ के देखो

वो कहाँ रहना चाहे


उसे तो पसंद था

दिल में रहना तेरे


पर तूने तो पाल रखा था

नफ़रतों को वहाँ पर


जिस दिल में आकर

वो बसना चाहे


जिस दिल में आकर

वो बसना चाहे


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