।। इंक़लाब ।।

।। इंक़लाब ।।



इंक़लाब ने बदस्तूर ज़ारी रखा है सफर
हुक़ूमत कभी समझती ही नहीं

सोचती है के बिखर जाएंगे
इंक़लाब लाने वाले
मगर जिसको मोहब्बत है 
इंक़लाब होने से
वो बिखरते नहीं
पैदा करते हैं
और इंक़लाब।

इंक़लाबी वो नही
जो कत्ल करता है औरों का
बल्कि इंक़लाबी वो है
जो जगा दे आस 
के अभी इंक़लाब बाक़ी है

के बाक़ी है अभी इंसाफ होना
और इंसाफ दिलाएगा
ये इंक़लाब।
इंक़लाबी वही है
जो जगा दे आस।

जो सोचते हैं
के हिंसा से ला सकते हैं
इंक़लाब,
वो नासमझ हैं
क्योंकि किसी का हक़ मारकर
इंक़लाब नहीं पैदा होता।
हक़ मारकर
पैदा होता है तो
एक बटा हुआ समाज,
पैदा होता है एक बर्बाद घर,
पैदा होते हैं बिखरे हुए लोग,
पैदा होती है जहालत,
पैदा होती है खुदगर्ज़ी,
पैदा होते हैं गुमराह करने वाले नेता।

इसलिये इंक़लाब अगर ज़रूरी है
तो कर
तो बढ़ा हाथ
साथ ले औरो का
जगा उन्हें
कर इंक़लाब।
पर ऐसा कि मोहब्बत
पैदा हो
कर इंक़लाब
मगर ऐसा कि मिटे जहालत
कर इंक़लाब
मगर ऐसा कि तरक़्क़ी 
पैदा हो
कर इंक़लाब
और साबित कर
के मोहब्बत ही सबसे बड़ा
इंक़लाब है
के मोहब्बत ही सबसे बड़ा
इंक़लाब है।

ये संदेश है उन लोगों को
जो लाना चाहते हैं
इंक़लाब
मगर बंदूकों से
इंक़लाब बंदूकों से आ ही नहीं सकता
क्योंकि मोहब्बत ही सबसे बड़ा
इंक़लाब है।

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