।। जो लिखते हैं दो टूक ।।

।। जो लिखते हैं दो टूक ।।



सरकारें काग़ज़ पर चला करती हैं
कुछ लोग ज़िंदा हो जाते हैं काग़ज़ों पर
और कुछ लोग मर जाते हैं इन्हीं काग़ज़ों में
महल भी बन जाते हैं काग़ज़ों के सहारे
और कश्तियाँ भी काग़ज़ों की चला करती हैं

बड़ी अहमियत रखते हैं 
ये काग़ज़ सरकारी दफ्तरों में जनाब
के बिल्डिंगे काग़ज़ पर बना करती हैं
तो कभी जल जाते हैं ये कागज़
किसी की चोरी छुपाते-छुपाते

कभी इन्हीं कागज़ों पर लिखा जाता था इंक़लाब
अब तो कागज़ गुलाम हुए जाते हैं
एक दिन एक कागज़ अचानक मुझसे बोल पड़ा
कि तू छोड़ ये सब लिखना
बड़ा क्रांतिकारी समझता है अपने आपको
लिख वो जो लोगों को पसंद आये
लिख वो जिससे मैं उस काग़ज़ में बदल जाऊं
जिसपर हो बापू की तस्वीर
छोड़ ये सब लिखना

लेकिन मुझे उसकी बात रास न आई
कैसे लिखूं सिर्फ दूसरों को खुश करने को
अपने आप को कैसे दूंगा जवाब
मैं कागज़ से बोला
कि तुझे अपनी अहमियत नहीं पता
तेरी अहमियत सिर्फ उन चंद लोगों के कारण ही है
जो लिखते हैं सच
जो लिखते हैं वो जो लिखा जाना चाहिये
जो लिखते हैं दो टूक

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