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।। रात भर ।।

।। रात भर ।। मुझे नींद नहीं तेरी याद चाहिए। तेरी याद हो तो जाग सकता हूँ रात भर। तेरी याद भी नहीं मुझे तू ही चाहिए। तू हो पास तो निहार सकता हूँ तुझे रात भर। याद है देखा था तुझे जब पहली बार। सिर्फ देखा था और सो नहीं पाया था रात भर। वो तेरी याद की पहली रात थी। इबादत में तेरी जागा था रात भर। शक़ था तुने पसंद किया था कि नहीं। कई रातें ये सोच कर जागा था रात भर। फिर वो तेरा इकरार करना कि तुझे मंज़ूर था साथ मेरा। खुशी का जाम यूँ चढ़ा कि नशे में जागा था रात भर। वो रात थी, या नशे का जाम थी शायद झूमता खुमार में जागा था रात भर। सिलवटें तनहाइयों में बढ़ने लगी थी चादरें भी तन्हाई मेरी बयां करने लगी थीं। जागती थीं वो भी मेरे साथ रात भर। जागे हुए बस ख्वाब चला करते थे, ख्वाब में कुछ मंज़र हुआ करते थे। कुछ खूबसूरत, कुछ रूमानी से और मंजरों में घूमते थे हम और तुम रात भर। फिर वो दिन आया जब हम मिले थे दोबारा। वो थोड़ा सा वक़्त बिताना तुम्हारे साथ मुझे फिर से तन्हा कर गया रात भर। फिर तुमसे बाते होती रही फोन...

।। एक छोटी कहानी ।।

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।। एक छोटी कहानी ।। छोटी छोटी कहानियों को बड़े एहसासों में मत बदलो। तुम भी एक छोटी कहानी हो और मैं भी एक छोटी कहानी हूँ। रफ्तार तुम्हारी मुझसे ज़्यादा हो सकती है हो सकता है कि तुम मुझसे आगे निकल जाओ। पर तब भी तुम एक छोटी कहानी ही हो और मैं भी एक छोटी कहानी ही हूँ। कोई बुद्ध से पूछ के देखे महावीर ने भी यही कहा था। के तुम भी एक छोटी कहानी हो और मैं भी एक छोटी कहानी हूँ। ये जस्बात बड़े गहरे हो चले हैं मेरे, फिक्र करने लगा हूँ ज़माने की। मुझे लगने लगा है कि ज़माने को बदल दूंगा मैं। बड़ा घमंड हो चला है मुझे अपने आप पर। लगने लगा है कि सब कुछ हासिल कर सकता हूँ मैं। यही सोचते-सोचते यूँ ही भागते-भागते। भूल ही गया था मैं भूल गया कि घमंड किस बात का? दूसरों की तेज रफ्तार देखता रहा और उसी रफ्तार में खो दिया अपने अक्स को। खो दिया वो जो मेरा अपना था भूल गया अपने वजूद को। भूल गया कि ये रफ्तार बड़ी बेगैरत है भूल गया कि इस रफ्तार ने डुबोए है कई जहाज़, उड़ाए हैं कई मकान। रफ्तार बढ़ती रही तन्हाई जमती रही। वजूद खोता रहा रोज़ मिटता रहा। पर एक दिन पीछे मुड़ कर देखा देखा ए...

Barriers

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बेबाक़

बेबाक है तेरी आवाज़ पर यूँ न कर गुमां के दबा दी जाएगी। माथे की लकीरें तेरे चाहे जितनी भी ग़मज़दा हों वतन की खातिर कौन है जो देखेगा उन्हें माथे पर ही तेरे रौंद दी जाएंगी। ज़बान संभाल के बोल ज़रा के तख्तनशीं अभी-अभी आया है शोर मचाया तो तेरी आवाज अभी ही दबा दी जाएगी। तू चूक जाएगा सच न बोल पायेगा के बोला अगर सच तो ज़बान तेरी काट दी जाएगी। लहू-लुहान हो जाया करते हैं लोग तेरे शहर में क्योंकि ये राजधानी है तख़्त सजते है तेरे शहर में क्योंकि ये राजधानी है मत बोल तख़्त के ख़िलाफ़ क्योंकि ये राजधानी है और अब अगर बोल ही दिया तो मांग ले माफी क्योंकि ये राजधानी है। माना बेबाक है तेरी आवाज़ पर यूँ न कर गुमां के दबा दी जाएगी। शानदार सा एक मुखौटा ढूंढ ओढ़ले अपने चेहरे पर मगर बोल मत बोला, तो अगले ही पल कब्र तुझे बुलाएगी। रोज़ रात को उठ के जो टटोलता है तू अक्स अपना तू जो सोचता है कि न बोल के तू पाप करता है तो ज़रा देख उनके घरों में लगे संगेमरमर तुझपे हंसते हैं। कहते हैं कि देख हमारे मालिक को सब झूठ बोलने का नतीजा है आज़मा के त...

।।ये विस्तार तेरा।।

।।ये विस्तार तेरा।। कौन सा विस्तार कैसा विस्तार मानव तू संकुचित रहा है और संकुचित रहेगा। कौन कहता है ईश्वर है तुझमें कौन कहता है तू है धार्मिक। तू सोता रहा है तू सोता रहेगा। अहंकार जागा तो तुझसे ही जागा। तू खोता रहा है तू खोता रहेगा। खोया है तूने ये मन का उजाला। खोया है तूने ये आनंद सारा तू खोता रहा है तू खोता रहेगा। ये मन के उजाले यूँ न मिल सकेंगे। के पाला है तूने लालच का खंजर। लालच जिया है लालच जियेगा। तू सोता रहा है तू सोता रहेगा। क्या याद है तुझको प्रेम का उजाला। तूने पिया है तो नफरत का प्याला। नफरत को जिता कर तूने प्रेम है मिटाया। भूला तू सब कुछ सिवाय नफ़रतों के। तू जलता रहा है तू जलता रहेगा। ज़रूरी नही कि तू खंजर ही घोंपे। ज़रूरी नहीं कि जलाए दूसरों को। तू जलता रहा है तू जलता रहेगा। ये विस्तार तेरा तभी ही सकेगा के लाये तू ज्योति के प्रेम तू उगाए। ये विस्तार तेरा तभी हो सकेगा के ध्यान से तू अपना अंतर्मन जलाए। ये विस्तार तेरा तभी हो सकेगा के थोड़ा तू आगे बढ़ ...

।।कौन दिलाता आज़ादी।।

।।कौन दिलाता आज़ादी।। मैंने अभी बोलना शुरू भी नही किया था कि वो बोले रुक मत बोल मैने कहा सुनिए तो सही बोलने तो दीजिए। वो बोले नहीं तू मत बोल कि तू हवा के विपरीत ही बोलेगा बोलेगा और कई राज़ खोलेगा। तू चुप ही रह तेरी चुप्पी ही मुझे समझ आती है। क्योंकि तू जब बोलता है तो मैं खुद से नज़रें नहीं मिला पाता। सोचने लगता हूँ कि तू क्यों बोलता है। फिर भी मैंने बोलने की कोशिश की वो बोले चुप तू चुप रह मैं नही बोलने दूंगा तुझे तू चुप रह बांधले अपने मुंह पर पट्टी वो बोले सिर्फ मुँह पर ही नही आंखों पर भी बांध। क्योंकि जब देखेगा तभी तो बोलेगा ऐसे ही तो राज़ खोलेगा। और तू बोल मुझे कोई परेशानी नही थी लेकिन तू जब बोलता है नकारात्मक ही बोलता है। अरे तुझे नज़र ही नही आते मेरे अच्छे काम। तू जब भी बोलता है मेरी खामियां खोलता है। तू नकारात्मक है इसीलिए मैं तेरी बातें नहीं सुनना चाहता। तुझे क्या पता सत्ता कितनी मुश्किल से मिलती है। तुझे क्या पता सत्ता कितना सुख देती है। और तू चाहता तू बोले मेरे राज़ खोले। तू बोल नहीं र...

नकाबों का पहनना

नकाबों का पहनना बदस्तूर ज़ारी है वो कल भी वैसे थे वो आज भी वैसे ही हैं। कल आए थे मेरे पास बहती हवाओं का बहाना लेकर, कहते थे कि क्या ज़माना है हवाओं ने पत्तों का साथ देना छोड़ दिया। उड़ा ले जाती हैं पेड़ो की परवाह किये बगैर। हमने भी बड़े ध्यान से सुना उनको, लगता था कि सारे जहां की फिक्र है उनको। कल यूँ टहलते हुए कहीं जा रहा था मैं देखा तो साहब रिक्शे से उतर रहे थे। दो पैसे के लिए झगड़ पड़े रिक्शे वाले से दो हाथ भी जड़ दिए बेचारे को। नक़ाब यूँ नज़र आया मुझे उनका वो कल भी वैसे थे वो आज भी वैसे ही हैं। नकाबों का पहनना बदस्तूर ज़ारी है वो कल भी वैसे थे वो आज भी वैसे ही हैं। सलामती मुझसे पूछते थे रोज़ बता देता था अपना हाल। बड़ी शराफ़त से मैं भी उनको मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते थे। देखता था रोज़ उनको आवारा बच्चों के सर पर हाथ फेरते। कभी देखता था उनको देश के लिये बड़े परेशान नज़र आते। कल ही देखा उनको उनके ही घर में, शराब पी कर अपने ही बच्चे को मारते, गाली देते। नक़ाब यूँ नज़र आया मुझे उनका वो कल भी वैसे थे वो आज भी वैसे ही हैं। नकाबों का पहन...