।। न तुम ये हो न वो हो ।।

।। न तुम ये हो न वो हो ।।


सिमट जाता है
सायों के जंगल में
ये सारा संसार
न तुम ये हो न वो हो।

कर सकते हो
जितना भी चाहे
कर लो गुमान, पर
न तुम ये हो न वो हो।

भटकते रहते हैं
जीवन भर कुछ
कर जाने की चाहत लिए
भूल जाते हैं मगर
न तुम ये हो न वो हो।

राह भटके हुए भी
मानते है खुदको
मालिक गुलिस्तां का
भूल जाते हैं मगर
न तुम ये हो न वो हो।

भृमजाल सा है
ये संसार सारा
तुम खुद को कुछ भी समझो, मगर
न तुम ये हो न वो हो।

कितना भी चाहे
कर सकते हो गुमान
टूटेगा एक दिन मगर, क्योंकि
न तुम ये हो न वो हो।

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