वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
सियासत पर हैं आज तो उन्ही का कब्ज़ा
इसीलिए वो और बेरहमी फरमाने लगे हैं।
वो तो पढ़े लिखे हैं कुछ लोग
जो उनको उनकी असलियत समझाने लगे हैं।
अनपढों में है उनकी पहचान सारी
बदस्तूर अनपढ़ ही उनको भाने लगे हैं।
डिग्री लाये थे पढ़े लिखों को फुसलाने के लिए
पोल खुल ही गई क्योंकि अब रिजल्ट आने लगे हैं।
कल रात की ही बात है घुसे हमारे घर में वो
उनके हाथों में डंडे आने लगे हैं।
पूछा कि इनकी क्या ज़रूरत है
बिना जवाब वो डंडे चलाने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
ऐसी ही है ये नफरत की फितरत उन्ही की
पर इल्ज़ाम दूजों पर लगाने लगे हैं।
कहते थे कि तरक्की लाएंगे तेरे देश में
पर नफ़रतों का बाज़ार लाने लगे हैं।
मज़हब की तो बात ही न पूछो दोस्तों
वो मज़हब को भी सियासत का गुलाम बनाने लगे हैं।
कालिख दूसरों पे मल के
खुद को मासूम बताने लगे हैं।
सियासत का रंग वो भूल गए हैं शायद
इसीलिए मग़रूर नज़र आने लगे हैं।
और ये इल्ज़ाम दूजों पर उन्होंने ही लगाया था कभी
आज कटघरे में वो खुद नज़र आने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
कहीं बुरा न लग जाए उन्हें ये सोच के हम सहते रहे
पर वो तो अपना नाशुक्रापन दिखाने लगे हैं।
रोज़ की ही तरह सोये थे बच्चे अपने कमरों में
पर वो तो लुटेरे बन के आने लगे हैं।
सियासत का एक पहलू ये भी है कि दबा दिया जाए
वो इसे ही आज़माने लगे हैं।
शिकस्त यूँ ही नही दी जाती है हमेशा
वो दखलंदाजी आज़माने लगे हैं।
सुनना तो उनकी फितरत भी नही थी
अब तो कान में रुई ढुंस के आने लगे हैं।
आंखे तरेर लिया करते थे पहले कभी-कभी
अब तो सीधे-सीधे आंखें दिखाने लगे है।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
पर दिन ऐसे ही न रहेंगे हमेशा
ये उनको हम भी समझाने लगे हैं।
रात ऐसे ही न रहेगी हमेशा
सुबह को हम भी जगाने लगे हैं।
तख्तनशीन को गुमान हो ही जाता है
पर हम भी उसे अब आज़माने लगे हैं।
के कब तक तुझे गुमान रहेगा खुद पर
तेरे जाने के दिन अब करीब आने लगे हैं।
रोना तुझे भी पड़ेगा तख़्त से जुदा होकर
के तेरी तस्वीर पर हम फूल चढ़ाने लगे हैं।
खो जाएगा तेरा नाम इन हवाओँ में
रुख हवाओँ का हम बदलवाने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
#authornitin
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
सियासत पर हैं आज तो उन्ही का कब्ज़ा
इसीलिए वो और बेरहमी फरमाने लगे हैं।
वो तो पढ़े लिखे हैं कुछ लोग
जो उनको उनकी असलियत समझाने लगे हैं।
अनपढों में है उनकी पहचान सारी
बदस्तूर अनपढ़ ही उनको भाने लगे हैं।
डिग्री लाये थे पढ़े लिखों को फुसलाने के लिए
पोल खुल ही गई क्योंकि अब रिजल्ट आने लगे हैं।
कल रात की ही बात है घुसे हमारे घर में वो
उनके हाथों में डंडे आने लगे हैं।
पूछा कि इनकी क्या ज़रूरत है
बिना जवाब वो डंडे चलाने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
ऐसी ही है ये नफरत की फितरत उन्ही की
पर इल्ज़ाम दूजों पर लगाने लगे हैं।
कहते थे कि तरक्की लाएंगे तेरे देश में
पर नफ़रतों का बाज़ार लाने लगे हैं।
मज़हब की तो बात ही न पूछो दोस्तों
वो मज़हब को भी सियासत का गुलाम बनाने लगे हैं।
कालिख दूसरों पे मल के
खुद को मासूम बताने लगे हैं।
सियासत का रंग वो भूल गए हैं शायद
इसीलिए मग़रूर नज़र आने लगे हैं।
और ये इल्ज़ाम दूजों पर उन्होंने ही लगाया था कभी
आज कटघरे में वो खुद नज़र आने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
कहीं बुरा न लग जाए उन्हें ये सोच के हम सहते रहे
पर वो तो अपना नाशुक्रापन दिखाने लगे हैं।
रोज़ की ही तरह सोये थे बच्चे अपने कमरों में
पर वो तो लुटेरे बन के आने लगे हैं।
सियासत का एक पहलू ये भी है कि दबा दिया जाए
वो इसे ही आज़माने लगे हैं।
शिकस्त यूँ ही नही दी जाती है हमेशा
वो दखलंदाजी आज़माने लगे हैं।
सुनना तो उनकी फितरत भी नही थी
अब तो कान में रुई ढुंस के आने लगे हैं।
आंखे तरेर लिया करते थे पहले कभी-कभी
अब तो सीधे-सीधे आंखें दिखाने लगे है।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
पर दिन ऐसे ही न रहेंगे हमेशा
ये उनको हम भी समझाने लगे हैं।
रात ऐसे ही न रहेगी हमेशा
सुबह को हम भी जगाने लगे हैं।
तख्तनशीन को गुमान हो ही जाता है
पर हम भी उसे अब आज़माने लगे हैं।
के कब तक तुझे गुमान रहेगा खुद पर
तेरे जाने के दिन अब करीब आने लगे हैं।
रोना तुझे भी पड़ेगा तख़्त से जुदा होकर
के तेरी तस्वीर पर हम फूल चढ़ाने लगे हैं।
खो जाएगा तेरा नाम इन हवाओँ में
रुख हवाओँ का हम बदलवाने लगे हैं।
वो खुद अपने पर्दे हटाने लगे हैं
अंधेरे में छिप-छिप के आने लगे हैं।
और जब भैंस पर अपना हक़ न जता सके
तो छिप-छिप के लाठी दिखाने लगे है।
#authornitin
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