इंतेज़ार



इंतेज़ार

कभी एक दरिया यूँ ही छलक जाता है।
आंखे मेरी इंतेज़ार करती है तेरा,
पर निकल किसी और कि आंखों से जाता है।
ये दरिया एक कहानी कहता है।
के कभी यूँ ही तेरा इंतेज़ार करते हैं हम।
और तू सब जगह है,
ऐसा लोग कहते हैं,
बस यही सोच के खुद को बेकरार करते हैं हम।
गिला तुझसे है मगर,
के तू न हुआ इस बेकरारी में शामिल अब तक।
पर यूँ ही तेरा इंतेज़ार करते हैं हम।
के इस इंतेज़ार का मज़ा हमे आने लगा है।
तू मत आ, तेरी मर्ज़ी।
पर अब तो उस बेकरारी का भी इंतेज़ार करते है हम।
उस दरिया का भी शुक्रिया क्या अदा करूँ।
आंखे भी तो उसी की है शायद,
रोता भी तो वही है शायद,
इंतेज़ार और सिर्फ इंतेज़ार करते है हम।
यूँ ही नही मिला करते हैं खुद से,
लोगो ने अक्सर कहा हमसे।
पर ऐसे ही अक्सर दरिया पार करते हैं हम।
के कभी यूँ ही तेरा इंतेज़ार करते हैं हम।
#authornitin

लेखक की अन्य पुस्तकों की जानकारी प्राप्त करने के लिए कृपया अपना ईमेल पता कमेंट बॉक्स में कमेन्ट करें। कृपया इस ब्लॉग के बारे में अपने अनुभव को भी कमेंट के माध्यम से बताएं।


लेखक से फेसबुक एकाउंट पर जुड़ने के लिए नीचे क्लिक करें-
https://www.facebook.com/author.nitin


या। 

https://www.facebook.com/nitinsri982/

To connect with the author-

Author's Amazon page-

bit.ly/am_nitin_page 

Author's smashwords page

bit.ly/sm_nitin_page

Twitter-

@nitinsri982

Facebook-

http://bit.ly/fb_author 

Comments

Popular posts from this blog

Importance of communication

Allahabad book launch

An excerpt