उपाध्याय सर की सीख
शिक्षक हम सभी के जीवन में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुझे यकीन है कि हममें से सभी के जीवन में कुछ ऐसे शिक्षक ज़रूर होते हैं जिन्हें हम आजीवन याद रखते हैं। कुछ को किसी कारण से और कुछ को किसी और कुछ को सम्हाल कर बड़े सम्मान के साथ। मेरे जीवन में भी ऐसे बहुत से शिक्षक रहे जिन्हें मैं चाह कर भी नही भूल सकता। उन सभी को तो एक साथ याद नही कर सकता। लेकिन उनमें से एक मुझे आज याद आ रहे हैं, उपाध्याय सर्। कुछ भी हो लेकिन उस ज़माने के ज़्यादातर शिक्षक अपने कार्य को लेकर गंभीर होते थे।
उपाध्याय सर मैथेमेटिक्स के शिक्षक थे इसलिए जैसे की मैथ्स के ज़्यादातर शिक्षक होते हैं वो भी थोड़े स्ट्रिक्ट थे। हालांकि मैंने उन्हें जल्दी किसी को मारते हुए नहीं देखा लेकिन ज़रूरत पड़ने पर डाटते थे। हालांकि मैं जिस बात के लिए उन्हें याद करता हूँ वो उनके द्वारा दी गई एक शिक्षा थी जो मुझे आज भी याद है। एक बार उन्होंने बताया कि वो जहां रहते थे उसके पास एक मलिन बस्ती थी जहां अक्सर उन्हें कुछ गरीब बच्चे मिलते थे। वो अपने साथ उनके लिए कुछ न कुछ ले जाते थे और कुछ समय उनके साथ व्यतीत करते थे।
उन्होंने बताया कि वे उन बच्चों को सफाई का महत्व समझाते रहते थे। लेकिन बार-बार समझाने के बाद भी उन बच्चो पर उनकी बातों का कोई खास असर नही पड़ता था। शायद इसलिए कि उनके माता पिता मज़दूरी पर निकल जाते थे और उन्हें ज़्यादा समय नही दे पाते थे और इस कारण बच्चे थोड़े लापरवाह थे। एक दिन उपाध्याय सर ने अपनी बात समझाने के लिए एक बच्चे का एक हाथ अच्छी तरह साबुन से धोया और दूसरा हाथ वैसे का वैसा छोड़ दिया और फिर दोनों हाथ एक साथ दिखलाये। बच्चे को अंतर समझ आ गया क्योंकि साफ हाथ ज़्यादा सुंदर दिखलाई दिया। वो बच्चा दूसरा हाथ भी धुलने की ज़िद करने लगा तो उपाध्याय सर ने उससे कहा कि दूसरा हाथ वो अपने आप धुले।
इस घटना के बाद जब वो दुबारा बस्ती में गए तो उन्होंने देखा कि ज़्यादातर बच्चे सफाई पर ध्यान देने लगे थे और उन्हें बदलाव साफ महसूस हुआ। ये वही महत्वपूर्ण सीख है जिसके कारण मैं उपाध्याय सर को हमेशा याद रखूंगा। अगर आप को किसी के जीवन मे बदलाव लाना है तो उसे वो साफ हाथ दिखलाना होगा, उसे वो बेहतर जीवन दिखलाना होगा, उसे वो अंतर महसूस कराना होगा।
अब इस सीख का इस्तेमाल हिंदुस्तान की बेहतरी के लिये कैसे हो सकता है ये भी समझ ले। भारत की आबादी हमें एक बेहद बड़ा बाज़ार उपलब्ध करवाती है। लेकिन क्या कारण है कि हम इस बड़े बाज़ार का उपयोग नही कर पा रहे। चीन भी अपनी आबादी के कारण एक बड़ा बाजार है और इस बड़े बाजार का उपयोग चीन बखूबी कर रहा है। आखिर हम क्यों नही कर पा रहे?
कारण भारतीयों की क्रय शक्ति का कम होना। भारत की बहुत बड़ी आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर है। भारतीय व्यापारी को ये बात समझनी होगी कि उसे अगर अपना व्यापार बढ़ाना है तो उसे इस क्रय शक्ति को भी बढ़ाना होगा। इस क्रय शक्ति को बढ़ाने का एक ही तरीका है कि उस आबादी को सम्रद्ध करना होगा जो गरीब है। अब सवाल ये है कि इस देश में प्रमुख तौर पे गरीब है कौन। और अगर आप जवाब ढूंढ़ो तो आपको जवाब मिलेगा की प्रमुख तौर पे गरीब हैं किसान और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूर। बात किसानों से शुरू करते हैं।
सच तो ये है कि ये व्यापारी किसानों की मदद कर सकते हैं अगर वो नई तकनीके उन तक पहुंचाने में मदद करें। अगर आप यूरोप या अमेरिका या रूस के किसानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों की तुलना हिंदुस्तान के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों से करे तो आप पाएंगे कि यहां का किसान तकनीक के क्षेत्र में बहुत पीछे है। छोटे किसान अभी भी आपको बैलों से हल जोतते नज़र आएंगे। यहां आपको कार खरीदने के लिये तो सस्ती दर पे लोन मिल सकता है परंतु खेती में इस्तेमाल की जाने वाली नई मशीनों के लिए नही। कारों पे लोन कम दर में उपलब्ध होने की वजह सरकार और ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनियां हैं। इसी तरह की पहल करने की ज़रूरत कृषि क्षेत्र में भी है।
उपाध्याय सर ने जिस तरह से साफ हाथ दिखा कर एक अच्छी ज़िन्दगी के लिए प्रेरित किया था उसी तरह नई तकनीक को सुगम बना कर व्यापारी किसान को भी उसी तरह से एक नई ज़िन्दगी का सपना दिखा सकते हैं, उन्हे वो नई तकनीक रूपी साफ हाथ दिखा सकते हैं और मुनाफा भी कमा सकते हैं। जापान का किसान थोड़ी सी ज़मीन में मल्टीस्टोरी खेती कर के ज़्यादा मुनाफा कमा रहे हैं, अब ग्रीनहाउस खेती भी कई देशों और भारत में भी किसानों का मुनाफा बढ़ा रही है। ज़रूरत नई तकनीकों को सुगम बनाने की है।
अब मज़दूरों की बात करें तो कहानी यहाँ भी वैसी ही है। एक बार डिसकवरी चैनल पर देख रहा था और विभिन्न देशों के ट्रक ड्राइवर्स की जीवन शैली दिखाई जा रही थी। उस प्रोग्राम में कई देशों में इस्तेमाल किये जाने वाले ट्रक दिखाए गए। और काफी देशों में ट्रक एयर कंडिशन्ड थे और एक छोटा सा फ्रिज भी था जिसकी हिंदुस्तान में कल्पना भी नहीं करता कोई। ये कोई मुश्किल तकनीक नहीं मगर शायद ही कोई ट्रक मालिक अपने ड्राइवर की सुविधा के लिये कुछ ज़्यादा खर्च करना चाहता है। उन्हें भी थोड़ी बेहतर ज़िन्दगी जीने का हक़ है। मनरेगा के बारे में बड़ी बातें होती हैं लेकिन इस योजना के असफल होने का कारण इसको उन लोगों से न जोड़े जाना है जिनको मज़दूरों की ज़रूरत होती है। जैसे मान लीजिए कि मुझे एक मज़दूर की ज़रूरत है तो क्यों न मैं मनरेगा में पंजीकृत मज़दूर से कार्य करवाऊं और उसकी मज़दूरी दूं और इसके बदले मुझे इनकम टैक्स में कुछ छूट मिले। इससे उसको भी रोज़गार मिला और मुझे भी थोड़ा फायदा। और सरकार के पास भी असंगठित क्षेत्र के आंकड़े आएंगे, जो कि वो आगे की योजनाओं में इस्तेमाल कर सकती है।
ज़रूरत उपाध्याय सर के मूल मंत्र को याद रखने की है।
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